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भारत में कई ऐसे व्यंजन हैं जो दूसरे देशों से आए हैं और लोगों को उसके बारे में पता भी नहीं है. ऐसा ही एक व्यंजन है साबूदाना. व्रत-त्योहार के मौके पर साबूदाने (Sabudana historical past) का सेवन लोग करते हैं क्योंकि इसे शुद्ध माना जाता है. नवरात्र के दौरान साबूदाने की खिचड़ी एक खास व्यंजन है जिसका सेवन लोग करते हैं. इसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा काफी होती है, साथ में स्टार्च भी होता है जिससे पेट लंबे वक्त तक भरा रहता है. आज हम आपको साबूदाने के फायदे नहीं बताने जा रहे, बल्कि ये बताने जा रहे हैं कि ये व्यंजन ब्राजील और जीन से भारत (How Sabudana reached India) कैसे पहुंच गया और कैसे इसने एक बार लाखों लोगों की जान बचाई.

साबूदाना को आजकल लोग व्रत में भी इस्तेमाल करते हैं. (फोटो: Canva)

द बेटर इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार साबूदाना टापिओका (tapioca or cassava root) या कसावा की जड़ों से बनता है. इसके साफ किया जाता है और जड़ को क्रश किया जाता है. इससे दूध जैसा एक तरल पदार्थ (How sabudana is made) निकलता है. पदार्थ से जब सारी गंदगी निकाल दी जाती है तो फिर वो और गाढ़ा हो जाता है और मशीन की मदद से उसे गोल कर दिया जाता है. इसके बाद उसे स्टीम, रोस्ट और ड्राय किया जाता है. कुछ और स्टेप के बाद वो साबूदाना बनता है जिसे हम खाते हैं.

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साबूदाना, टापिओका की जड़ों से बनता है. (फोटो: Canva)

केरल की भूखमरी में बचाई थी सैकड़ों जान
टापिओका की जड़ें मूल रूप से ब्राजील में पाई जाती हैं. सीएन ट्रैवलर की रिपोर्ट के अनुसार चीन में तो हजारों सालों से इसका इस्तेमाल खाने में किया जाता था. पर केरल में इसका इसका इस्तेमाल सबसे पहले शुरू हुआ. इस्तेमाल के शुरू होने का भी इतिहास काफी अनोखा है. हुआ यूं कि साल 1800 के दौर में त्रावणकोर (Sabudana in Travancore) राज्य में भूखमरी फैली जिससे लोगों की जान जाने लगी. इस बात से वहां के राजा अयलेयम थिरुनल रामा वर्मा (Ayilyam Thirunal Rama Varma) और उनके छोटे भाई विशाखम थिरुनल महाराजा (Visakham Thirunal Maharaja) काफी चिंतित हुए. विशाखम एक वनस्पति-विज्ञानिक थे और उन्होंने अपने अनुभव से पता लगाया कि टापिओका के जरिए भुखमरी को कम किया जा सकता है.

दूसरे विश्व युद्ध में सैनिकों को खिलाया गया था साबूदाना
उन्होंने इन जड़ों की जांच की और पाया कि अगर इन्हें खास तरह से पकाया जाए, तो इन्हें खाया जा सकता है. उन्होंने अपने राज्य के लोगों से इसे खाने का आग्रह किया पर विदेशी जड़ होने के चलते लोग इससे बचते रहे. उन्हें लगा कि इसमें जहर भी हो सकता है. तब राजा ने फैसला किया कि वो अपने शाही खाने में इस पकवान को भी शामिल करेंगे. जनता में विश्वास पैदा करने के लिए उन्होंने सबसे पहले खुद इस डिश को खाया. जब जनता को भरोसा हो गया तो वो इसे खाने लगे और कई लोगों की जान बच गई. इसके अलावा दूसरे विश्व युद्ध के दौरान चावल की कमी होने पर सैनिकों को साबूदाना खाने को दिया जाता था. इसे केरल में कप्पा कहा जाने लगा और धीरे-धीरे ये पूरे भारत में फैल गया. सीएन ट्रैवलर के अनुसार प्रोसेस्ड साबूदाना 1940 के बाद से चीन से मंगाया जाने लगा क्योंकि वहां काफी सालों से इसका प्रयोग हो रहा था.

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