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Death Railway: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बना थाईलैंड से बर्मा रेल रूट को डेथ रेलवे के रूप में जाना जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस रेल रूट को बनने में 1 लाख 20 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई थी. यह रेलमार्ग 415 किमी लंबा है. युद्ध के बाद लाइन की मरम्मत की गई और सेवाएं बहाल की गई थी. अभी भी कंचनबुरी के उत्तर में नाम टोक तक यात्री सेवाएं चलती है. इस रेलवे रूट का सबसे फेमस और भयावह क्वाई नदी पर बना पुल है.

रेलवे के इतिहास में रुचि रखने वालों और द्वितीय विश्व युद्ध में निभाई गई भूमिका के लिए इस रूट को जाना जाता है. युद्ध के दौरान, जापानी सेना ने सिंगापुर से बर्मा तक के क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था. इसके बाद हिंद महासागर, अंडमान और बंगाल की खाड़ी में सक्रिय सहयोगी जहाजों के साथ जापानी बर्मा में अपने सैनिकों के लिए एक सुरक्षित जमीनी मार्ग बनाने चाहते थे. हालांकि पहले से ही बैंकाक से हुआ हिन और दक्षिण तक एक रेल लाइन था. लेकिन जापानियों द्वारा बैंकॉक के पश्चिम में एक ब्रांच लाइन बनाने का निर्णय लिया, जो बर्मा के उत्तर में स्थित थी.

थाईलैंड से बर्मा रेलवे का निर्माण थाईलैंड में नोंग प्लाडुक (कंचनबुरी से 50 किमी दक्षिण-पूर्व) और बर्मा में थानबुयाजत के बीच लगभग 415 किमी की दूरी के लिए किया गया था. जून 1942 में रेलवे के दोनों छोरों पर काम शुरू हुआ और 15 महीने बाद पूरा हुआ.

रेलवे ट्रैक बनाने में मारे गए थे लाखों लोग
थाईलैंड, चीन, इंडोनेशिया, बर्मा, मलेशिया और सिंगापुर सहित एशियाई देशों से 180,000 लोग और लगभग 60,000 मित्र देशों के कैदियों (पीओडब्ल्यू) को इस रेलवे रूट पर काम करने के लिए लगाया गया था. यहां की स्थिति बहुत ही बदतर थी और जापानी सेना द्वारा क्रूर व्यवहार किया गया था. हैजा, मलेरिया, पेचिश, भुखमरी या थकावट से मरने वाले 16,000 कैदियों के अलावा कम से कम 90,000 मजदूरों की मौत हो गई थी.

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